पहाड़ी महासु रे बारै दो
पहाड़ी महासु ज़ागा भारत देशौ रै हिमाचल प्रदेशौ री बीच़ौ दे बौड़ी-बौड़ी टीरौ आळे एक हौद च़ौज़ौरे तौंई आपणैं रीति-रवाज़ै पां भौरवे दौ बेताशे ज़ागा अ। ऐ ज़ागा प्राणैं बौख्तौ दौ ई औरै-औरै पेड़ौ, बौड़ै-बौड़ै घाळै, पाड़ौ, नौऔटौ, शांत गांओ, आपणीं मैनतै, आपु-मांज़ै बौड़िया पाक्कै रिश्तै, पूज़ा-पाठौ कौरणैं तौंई भौगवानौ री तैंई श्रौदा राखणैं दे बेगै मशूर ज़ागा रौए अ। महासु इलाकै दै रौऔणैं आळै माछौ क पाड़ी माछ बोलो जाई। इथौरै माछ खेच़ौ दो काम एरौ, आपु-मांजै मिलयौ रौअ, आपणीं ज़ागै री बादी च़ीज़ौ (प्रकृति) रे इज़ौत कौरौ तौंई एकी-दुजै रे मौदत कौरौ। एतणों ई नैंई इथौरै इलाकै रे खास सांस्कृतिक ज़ाणं-प्रैणं तिनौरी आपणीं भाषै, गाणैं-गीतौ, तीज़-त्यारौ तौंई प्राणैं रीति-रवाज़ौ मानणैं रै जौरियै धिश जाऔ। पहाड़ी महासु ज़ागै दा बांति-बांति रै दार्मिक रीति-रवाज़ौ तौंई गांओ-पौरगणैं दी तरौक्की आणंणैं आळै आंदोलनौ रा बेगै औसौर पौड़ा अ। पौर बौख्तौ साथै एज़ी ज़ागै दे शिक्षा, सेवा तौंई नौए तरौक्के बी ओए अ। ऐंईयै इथौरै माछौ क आपणैं रीति-रवाज़ौ गांऊ बढ़ाओणैं तौंई तैंई पाक्कै टैंए दौ राखणैं क भौरी मौदत मिले अ।